गुणातीत महिला

मर्यादा में रहते हुए निरन्तर जिम्मेदारी का निर्वहन करने वाली महिला जिसमें प्रेम है, ममता है, श्रद्धा है। जो सदा आस्तीन बनी आपको सुधारने की कोशिश करती है, जो निश्छल उलाहना द्वारा आपके दुर्गुणों को दूर करने का सीधे-उल्टे उपाय बुनती रहती है। महिला परदे के पीछे की दुनिया है जो बिना प्रकट हुए प्राकट्य को विस्तार और स्वरुप देने में जुटी रहती है। बड़ी आकांक्षा नहीं होती है उसकी, वो बस आपका समर्थन, थोड़ा सहयोग और पूर्णतः स्वीकार्यता चाहती है। साहस हो या उदारता का रंग.. किसको कितना प्रयोग करना है इसका उसे सहज आभास होता है। उसे नाम नहीं चाहिए वह तो काम में ही रत रहकर आपके नाम को सार्थक करने में ही सर्वस्व लगाती रहती है। ईश्वर द्वारा प्रद्त आभास शक्ति महिला को निकट भविष्य की फिल्म दिखा देता है। वह भावों में रहते हुए भी अपनेआप को नियंत्रित रखने की कला में चतुर विदुषी है। स्मरण शक्ति, सहनशीलता और त्याग के मामले में तो महिला का कोई सानी ही नहीं है। महिला सौंदर्य है, आकर्षण है, जीवन की मधुरता है। अपने गुणों को विकसित करने के लिए महिला को एक आधार जरुरी होता है, वह कभी पति के रुप में, भाई और पिता के रुप में होता है। वह स्नेहवर्षा द्वारा परिवार को सिंचित करती रहें यह उसका प्रमुख उद्देश्य रहता है। महिला स्वार्थी भी होती है और इस स्वार्थ को समझ पाना पुरुष के सामर्थ्य में नहीं होता.. महिला के स्वार्थ के पीछे भी किसी निपट जरुरतमंद को सहयोग करने का उद्देश्य होता है। आप महिला की बातें सुन भर लेते हैं तो उसका दुख दूर हो जाता है। आपकी थोड़ी हमदर्दी उसके ह्रदय को अभिभूत कर देती है। आपके सहयोग से वह आनन्द के सागर में डूबती चली जाती है। शब्दों के अंबार है महिला को व्यक्त करने के लिए, पर महिला बड़ें-बड़ें पुरस्कार के लिए लालायित नहीं रहती वह छोटे-छोटे उपहार से ही मुग्ध हो जाती है। सम्मान महिला का प्रधान आभूषण है। वह ऊँचें पद के लिए व्याकुल नहीं रहती पर वह जहाँ भी हो जिस भी स्थिति में हो सम्मान चाहती है। सम्मान जो निष्कपट हो.. वासना से प्रेरित ना हो। महिला प्रेम करती है वासना से प्रभावित नहीं रहती.. वह भरोसा होने पर.. प्रेम को पाने के लिए.. स्वयं को सर्वस्व अर्पित कर देती है। पुरुष कभी महिला को समझ नहीं पाता क्योंकि वह सागर की तरह अथाह गहरी है। वह जितना डूबता है उतने जीवन के रुपों को मोती रुप में पाता है। पुरुष और महिला की रचना अलग है, प्रकृति भी अलग है, स्वरूप और भाषा भी अलग है.. यहाँ एक दूसरे को सुधारने से ज्यादा सर्वोपरि स्वीकारना होता है। 

प्रकृति, भाषा, स्वरूप के अलग होने के कारण  महिला-पुरुष एक दूसरे को बदलने के प्रयास से बचकर, "स्वीकार करें" तो सहज दिशा में सदा समर्थन मिलता है। महिला-पुरुष एक-दूसरे के पूरक है। महिला पुरुष का आधार है।

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