दहशत

समय का कोई भी कालखण्ड हो, ऐसा नहीं है कि उसमें दहशत ना रही हो और दहशत के भी अनेकों प्रकार है। कुछ सामाजिक दहशत होते हैं, कुछ मानसिक, कुछ व्यावसायिक और कुछ शारिरीक। दहशत समाज का बहुत बड़ा हिस्सा है, इससे समाज को सीधे प्रभावित करने की कोशिश की जाती है। दहशत से हम हमेशा बचने की कोशिश करते हैं पर समाज बचने नहीं देता। दहशत समाज का मुखौटा होता है। दहशत इतिहास में सदा से ही रहा है और सदा ही रहेगा और कुछ ना कुछ दहशत तो वर्तमान में भी है। दहशत के अनेक रुप होते हैं और कुछ प्राणी दहशत के अवसरों की खोज में रहतें हैं वह आपको बुरी तरह से विचलित या अच्छी तरह से प्रभावित कर सकते हैं। आप अब भी समाज या खुद के किसी दहशत से डरने के लिए तैयार हो रहें होगें या अपने किन्हीं अवसरों के भविष्य को लेकर शंका या आशा से भरे होगें। इन्हीं शंका या आशा के दौरान कोई आता है और जोरदार दहशत फैलाता है। दहशत से प्रभावित होना ना होना हमारे विवेक पर निर्भर है। दहशतों का भी चुनाव किया जा सकता है। मानसिक रुप से खुद से पूछें कि कौन-सी दहशत से आप प्रभावित होना चाहते हैं। समाज की प्रत्येक दहशत से प्रभावित ना हो। हमारे आसपास की फैली दहशतों में से 95 प्रतिसत से ज्यादा दहशतें किसी ना किसी के स्वार्थ से जुड़ी होती हैं। कुछ उदाहरण- खोने के भय (fear of loss) के प्रयोग द्वारा आपको सामान खरीदने के लिए लालायित करना।

देश-विदेश में फैली किसी वायरस का हवाला देकर आपको प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रुप से डराए रखना। 

दिल्ली का प्रदूषण भी एक दहशत का ही प्रकार है।

देश की बेरोजगारी या महंगाई का हवाला देकर लोगों की सोचने की क्षमता को सीमित करना।

अवसरों को ना बताते हुए हमेशा असफलता को स्थायित्व देने का दहशत भरा प्रयास।

धर्म के नाम पर सही या गलत(कुछ भी) कराने का दहशत भरा प्रयास।

शैक्षणिक भविष्य को लेकर हमेशा डराए रखना। 

आप अपने आसपास फैले लोगों, मीडिया, टेलीविजन, पेपर इत्यादि द्वारा महसूस कर सकते हैं कि आप कब दहसत में आ रहें हैं। इन दहशतों के बारे में हो सकता है कि कुछ सच्चाई हो पर ज्यादातर तो अफवाहें ही होती है और इन अफवाहों को ऐसे परोसा जाता है कि आप इन्हें झूठ मान ही नहीं सकते। दहशतों से कितना प्रभावित या भयभीत होना है कितना नहीं इसके आत्म जागृति आवश्यक है। आत्मजागृति का अर्थ है मस्तिष्क को खोलना और मस्तिष्क खुलता है अपने भीतर से। हमने खुद अपने आपको इस दहशत में रखा हुआ है कि दुनिया हमें सीखा रही है। एक बात याद रखनी जरुरी है कि दुनिया सीखाती नहीं बल्कि दहशत फैलाती है, सीखते हम खुद से हैं। दहशतों के बीच आत्मजागृति ही हमें राह दिखाती है। दहशतों के बीच यह लेख भी आपको दहशत लग सकता है, आप इस लेख से प्रभावित हो रहें है या भयभीत यह भी आपकी आत्मजागृति के स्तर पर निर्भर करता है। आत्मजागृति के लिए खुद को समय दीजिए, सीखिए कम-समझिए ज्यादा। आत्मजागृति हेतु प्रकाशवाणी का लेखन किया जा रहा है, आप चाहे तो यहाँ की पुरानी पोस्टस को पढ़ कर भी आत्मजागृति को कुछ समझ सकते हैं। प्रकाशवाणी का ध्येय ही आत्मजागृति है। 


पुरानी पोस्ट-

टिप्पणियां