उलझन (एक सुझाव)

जरुरी है कुछ करना निरन्तरता के साथ लगातार डटे रह कर, थोड़ा या ज्यादा जुटना जरूरी है, लोगों के साथ की प्रतिक्षा कब तक करेंगे, लोग आते हैं जाते हैं,  कुछ दूर साथ चलते हैं, कुछ लम्बे समय तक बने रहते हैं, जिसके पास जितना समय और आस्था होती है वो तब तक आपका साथ देता है, लोगों के समय और आस्था के प्रवाहित होने की प्रतिक्षा में; समय ना गवाते हुए स्वयं के समय और आस्था को धीरे या तेज कार्यों का ईधन प्रदान करते हुए काम में जुटे रहें। जब आप काम में जुटे रहते हैं तो परिस्थिति अनुसार कई कार्य बीच में आते हैं और उन कार्यों को भी करना होता है। हो सकता है यह कार्य आपके उद्देश्य के लिए ना हो, परन्तु यह आपका कर्तव्य आपकी जिम्मेदारी हो या इस कार्य से समाज को या किसी व्यक्ति को बड़ा लाभ होता हो तो भी इस कार्य में जुटा जा सकता है। इस तरह के कार्यों से आपका मूल उद्देश्य या मूल विचार प्रभावित होता है और जब आप वापस अपने मूल कार्यों में जुटना चाहते हैं तो आपकी निरन्तरता और तारतम्यता को वापस पाने में समय लगता है इसे ही Distraction कहते हैं और इस 'डिसट्रैक्शन' से हम जितनी जल्दी तत्परता से वापस आते है उतना ही हम जीवन को सही रुप में जी पाते हैं अन्यथा हम बिन कप्तान की जहाज की तरह इधर-उधर भटकते पाए जाते हैं। ऐसी परिस्थितियों में ही हम यह नहीं जान पाते कि हम असफल क्यों हो रहे हैं और हम अपनी क्षमता को लेकर ही सन्देह करते रहते हैं। समय बितते हुए हम फिर स्वयं को एक जुट करते हैं और किसी और दूसरे काम के लिए स्वयं को तैयार करते हैं, हम बड़ें मन से लगन से काम करते हैं और फिर कोई ऐसा दौर आता है कि समय परिस्थिति विचार या मनोवृत्ति हमें प्रभावित करती है और हम फिर उलझ जाते हैं। उलझना स्वाभाविक है पर इस उलझन से हम जितना ही तत्परता से वापस आते हैं उतना ही हमारे जीवन को दिशा मिलती है।

जब आप काम करेंगे तो उलझने आती रहेंगी, उलझनों से झल्लाईए मत, उन्हें भी जीवनचर्या का हिस्सा मानिए और अपने काम में जुटे रहिए, उलझने अपने आप दूर होती चली जायेंगी। जब हम बहुत ज्यादा तैयारी करके काम करने की सोचते हैं तो हमारा काम तैयारी में उलझ जाता है, एक निश्चित समय तक तैयारी के बाद काम में जुट जाइए, काम करते हुए सीखिए, गलतियों से सीखिए, गलतियाँ करते हुए सीखिए, गलतियाँ करने से मत डरिए, पर गलतियों को दोहराइए मत पर फिर भी गलती हो जाती है तो अपराधबोध में मत फसिए वापस काम में जुटिए। काम पर ध्यान दीजिए। जब आप काम पर ध्यान दे रहे होंगे तो काम होंगे। परिणाम भी आयेंगे। पर ऐसा नहीं है कि उलझने कम हो जायेंगी, उलझने कम हो ज्यादा वो तो रहेंगी बस उनका आकार और आधार बदला होगा। उलझनों से डरने से काम नहीं होगा उलझनों में रहते हुए भी काम करते रहने से काम होगा। काम करते समय भी विशेषज्ञता के पीछे मत भागिए, लगातार काम करते रहेंगे तो स्वतः ही विशेषज्ञ हो जायेंगे, स्वघोषित विशेषज्ञ मत बनिए और कोई आपको विशेषज्ञ बताए तो अंहकार भी मत कीजिए अन्यथा ज्यादा दिन टिक नहीं पायेंगे और धीरे-धीरे खोखले हो जायेंगे। उम्र चाहें कोई भी हो अपने भीतर के विद्यार्थी को मरने मत दीजिए। एक विद्यार्थी की तरह जीवन के हर पहलू से सीखने के लिए तत्पर रहिए, स्वयं की, अपने परिवार या बच्चों की तुलना किसी दूसरों मत कीजिए, प्रतिदिन ध्यान प्राणायाम और व्यायाम कीजिए, आपको जीवन ने बहुत कुछ दिया है आप भी जीवन को जितना दे सकते हैं वो दीजिए। आप जो चीज पाना चाहते हैं उसे देना सीखिए। धैर्य के साथ। भीतरी साहस को जगाए रखिए। भीतरी दुगुर्णो का सामना करना सीख जाएंगे तो बाहरी ताकत आपको डिगा नहीं सकती। इन सबके बीच काम करते रहिए और निखरते रहिए।


(बाकी ऐसी ही छोटी-छोटी बातें पढ़ने और काम में जुटने के लिए दूसरी पोस्टों तक जाए।)

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